सत्य नहीं छुपता क्यों तबहा हो रहा संसार ग्रन्थ भी यही कहते हैं गौ हत्या बना बर्बादी का प्रमुख कारण |

सत्य नहीं छुपता क्यों तबहा हो रहा संसार ग्रन्थ भी यही कहते हैं गौ हत्या बना बर्बादी का प्रमुख कारण |

पहले जब देश गुलाम था तब हिन्दुस्तान के अन्दर 300 गौ क़त्ल खाने थे आज इसकी संख्या निरंतर बढती जा रही है ।

हमारे आराध्यदेव श्री कृष्ण की धरती है यह । भगवान श्री कृष्ण से प्रेरणा लेकर हम धर्म का आचरण करते है लेकिन वाह रे भारतीयों यह क्या !क़त्लखानों की संख्या बढ़ती ही जा रही है । यह हमारे लिए सबसे ज्यादा शर्म की बात है ।

जब देश आजाद हुआ तो महात्मा गांधीजी ने कहा कि सबसे पहला कानून गौ हत्या पर बनेगा लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ गौ हत्या निरंतर बढ़ती ही जा रही है ।

गौ-माता हमारे देश की रीढ़ की हड्ड़ी है , और हम सभी समझ सकते हैं की हमारे शरीर की रीढ़ की हड्ड़ी टूट जाये तो हमारी क्या हालत होगी ?

आज बड़ी दुःख की बात है की हमारे भारत देश में रोजाना हजारों गायें कत्लखानों में कट रही हैं । सरकार से अपील है की गौ हत्या पर तुरंत रोक लगाई जाये वरना यह बर्बादी हर जगह आएगी और इस पृथ्वी का विनाश होजायेगा|

जिस प्रकार हमारे धर्म ग्रंथो में गौ माता की महिमा बताई गयी है उससे तो यही पाता चलता है की उनका पालन,पूजन,पोषण करना चाहिए तभी ये परमात्मा की बनायीं सुन्दर सृस्टि हमारे काम आपएगी वरना हम इसे अपने ही हाथो से नस्ट करदेंगे |

कथा:

गौ की उत्पत्ति की पुराणों में कई प्रकार की कथायें मिलती हैं। पहली तो यह है कि जब ब्रह्मा एक मुख से अमृत पी रहे थे तो उनके दूसरे मुख से कुछ फेन निकल गया और उसी से आदि-गाय सुरभि की उत्पत्ति हुई। दूसरी कथा में कहा गया है कि दक्ष प्रजापति की साठ लड़कियाँ थीं उन्हीं में से एक सुरभि भी थी। तीसरे स्थान पर यह बतलाया गया है कि सुरभि अर्थात् स्वर्गीय गाय की उत्पत्ति समुद्र मंथन के समय चौदह रत्नों के साथ ही हुई थी। सुरभि से सुनहरे रंग की कपिला गाय उत्पन्न हुई। जिसके दूध से क्षीर सागर बना।

प्राचीन काल से आर्य-जाति गौ की बहुत अधिक महिमा मानती आई है। ऋग्वेद तथा अन्य वेदों में भी गौ के गुणानुवाद के सैकड़ों मंत्र भरे पड़े हैं। गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने भी कहा है कि ‘गौओं में कामधेनु मैं हूँ।” गाय के शरीर में सभी देवता निवास करते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि धन की देवी लक्ष्मी जी पहले गाय के रूप में आयी और उन्हीं के गोबर से विल्व वृक्ष की उत्पत्ति हुई।

कपिल मुनि के शाप से जले हुये अपने साठ हजार पूर्वजों की राख का पता जब राजा रघु नहीं लगा सके तब वे गुरु वशिष्ठ जी के पास आये। गुरुजी ने दया करके उनकी आँखों में नन्दिनी गाय का मूत्र आँज दिया, जिससे रघु को दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई और वे पृथ्वी में दबी हुई अपने पुरखों की राख का पता लगाने में समर्थ हो सके।

गंगाजी को पहले पहल जब संसार (मृत्यु लोक) में आने को कहा तो वे बहुत दुखी हुई और आना कानी करने लगीं। उन्होंने कहा कि “पृथ्वी पर पापी लोग मुझ में स्नानादि करके अपवित्र किया करेंगे, इसलिये मैं मृत्युलोक में न जाऊँगी। तब पितामह ब्रह्माजी ने समझाया कि “लोग तुमको कितना भी अपवित्र करें किन्तु फिर भी गौ का पैर लगने से तुम पवित्र होती रहोगी।” इससे भी गौ और गंगा के हिन्दू धर्म से विशेष सम्बन्ध होने पर प्रकाश पड़ता है।

रामचन्द्र जी पूर्वज महाराज दलीप की गौ-सेवा का उदाहरण बड़ा महत्वपूर्ण है। उन्होंने एक दिन मार्ग में जाती हुई नन्दिनी को देखकर प्रणाम नहीं किया, इस पर उसके महाराज को पुत्रहीन होने का शाप दे दिया। इससे दुखी होकर वे गुरु वशिष्ठ के पास गये और शाप से मुक्ति पाने के लिए बड़ी विनय करने लगे। वशिष्ठ जी ने नन्दिनी गाय उनको दे दी और उसका भली प्रकार से पूजन और सेवा करने को कहा। उनके आदेशानुसार राजा और रानी दोनों मिलकर उसकी सेवा करने लगे। राजा गाय को वन में चराने ले जाते। वे नन्दिनी के चलने पर चलते थे, उसके बैठने पर बैठ जाते थे। एक दिन राजा का ध्यान जरा देर के लिए वन के दृश्य की तरफ चला गया कि नन्दिनी बड़े जोर से चिल्लाई। राजा ने देखा कि एक सिंह गाय को दबोच कर खाना चाहती है। उन्होंने तुरन्त अपना धनुष उठाकर तीर चलाना चाहा, पर दैवी मायावश तीर छूट न सका। तब राजा ने विवश होकर नन्दिनी गाय के बदले अपना शरीर सिंह को देने के लिये चुपचाप उसके सामने पड़ गये। पर जब कुछ देर तक पड़े रहने पर भी सिंह ने उनको नहीं खाया तो उन्होंने मस्तक उठाकर देखा। उस समय वह माया रूपी सिंह गायब हो चुका था और केवल नन्दिनी खड़ी प्रसन्न हो रही थी। राजा की इस अनुपम भक्ति से वह संतुष्ट हो गई और उसने राजा को पुत्र होने का वरदान दे दिया इसी प्रकार भारतवर्ष में सदा से बड़े-बड़े व्यक्ति गौ की सेवा में संलग्न रहे हैं और इसके प्रभाव से उनको यश, मान, धन आदि समस्त साँसारिक सफलतायें प्राप्त हुई हैं। वास्तव में गौ भारतवर्ष के सामाजिक और धार्मिक जीवन की एक स्तम्भ के समान है और उसे सदैव सुदृढ़ बनाये रखना हमारा परम कर्त्तव्य है।

यया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजङ्गमम्।
तां धेनुं शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम्॥

अनुवाद = जिसने समस्त चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है, उस भूत और भविष्य की जननी गौ माता को मैं मस्तक झुका कर प्रणाम करता हूं॥
|| जय गौमाता की||

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