मंदिर में स्थित शिवलिंग की पाताल तक है लंबाई, स्पर्श करने के लिए 14 सीढ़ियां नीचे उतरते हैं भक्त

मंदिर में स्थित शिवलिंग की पाताल तक है लंबाई, स्पर्श करने के लिए 14 सीढ़ियां नीचे उतरते हैं भक्त

भारत में वैसे तो अनेकानेक मंदिर शिवालय हैं परन्तु उत्तरप्रदेश के देवरिया जिले के रुद्रपुर में 11वीं सदी में अष्टकोण में बने प्रसिद्ध दुग्धेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग अपनी अनूठी विशेषता के लिए विश्वविख्यात है। इस शिवलिंग का आधार कहां तक है इसका आज तक पता नहीं चल पाया। मान्यता है कि मंदिर में स्थित शिवलिंग की लम्बाई पाताल तक है।
अंक ज्योतिषाचार्य एवं मंदिर के संबंध में अच्छी जानकारी रखने वाले माणिक चन्द्र पांडेय बताते हैं कि ग्यारहवीं सदी में इस मंदिर के वर्तमान स्वरुप का निर्माण तत्कालीन रुद्रपुर नरेश हरी सिंह ने करवाया था जिनका संभवत: सत्तासी कोस में साम्राज्य स्थापित था।
पांडेय के मुताबिक, यह मंदिर ईसा पूर्व के ही समय से यहां है। उनका यह भी कहना है कि पुरातत्व विभाग के पटना कार्यालय में भी नाथ बाबा के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर के संबंध में उल्लेख मिलता है।

मंदिर के बारे में पुजारी प्रदीप पांडेय ने बताया कि यह काशी के ही क्षेत्र में आता है और शिव पुराण में इसका वर्णन है। महाकालेश्वर उज्जैन की भांति इसे पौराणिक महत्ता प्रदान की गई है। यह उनका उपलिंग है। सबसे बड़ी बात है कि यहां लिंग को किसी मनुष्य ने नहीं बनाया, बल्कि यह स्वयं धरती से निकला है।
पाण्डेय ने बताया स्कन्दपुराण में भी इस मंदिर का वर्णन है तथा इसे द्वाद्वश लिंग की भांति महत्वपूर्ण बताया गया है। त्र्यम्बकेश्वर भगवान के बाद रुद्रपुर में बाबा भोलेनाथ का लिंग धरातल से करीब 15 फीट अंदर है। बताया जाता है कि इस मंदिर में स्थित शिव लिंग की लम्बाई पाताल तक है। अब तक इसकी गहराई का अंदाजा नहीं लगाया जा सका है। मंदिर के निर्माण में प्रयुक्त ईंट बौद्धकाल के बताए जाते हैं।

इस बात की जानकारी धीरे-धीरे तत्कालीन रुद्रपुर नरेश के कानों तक पहुंची तो उन्होंने वहां खुदाई करवाई। खुदाई में शिवलिंग निकला। राजा ने सोचा कि इस घने जंगल से शिवलिंग को निकाल कर अपने महल के आस-पास मंदिर बनवाकर इसकी स्थापना की जाए।
कहा जाता है कि जैसे-जैसे मजदूर शिवलिंग निकालने के लिए खुदाई करते जाते वैसे-वैसे शिवलिंग जमीन में धंसता चला जाता। कई दिनों तक यह सिलसिला चला। शिवलिंग तो नहीं निकला वहां एक कुआं जरूर बन गया। बाद में राजा को भगवान शंकर ने स्वप्न में वहीं पर मंदिर स्थापना करने का आदेश दिया।

भगवान के आदेश के बाद राजा ने वहां धूमधाम से काशी के विद्धान पंडितों को बुलवाकर भगवान शंकर के इस लिंग की विधिवत स्थापना करवाई। जब तक वह जीवित रहे, भगवान दुग्धेश्वरनाथ की पूजा-अर्चना और श्रावण मास में मेला आयोजित करवाते थे।
मंदिर में आज भी भक्तों को लिंग स्पर्श के लिए 14 सीढ़ियां नीचे उतरना पड़ता है। यहां भगवान का लिंग सदैव भक्तों के दूध और जल के चढ़ावे में डूबा रहता है। कहा जाता है कि प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन सांग ने भी जब भारत की यात्रा की थी तब वह देवरिया के रुद्रपुर में भी आए थे। उस समय मंदिर की विशालता एवं धार्मिक महत्व को देखते हुए उन्होंने चीनी भाषा में मंदिर परिसर में ही एक स्थान पर दीवार पर कुछ चीनी भाषा में टिप्पणी अंकित थी, जो आज भी अस्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होती है।
कई इतिहासकारों ने उस लिपि को पढ़ने की चेष्टा की लेकिन सफल नहीं हो पाए। मंदिर के पश्चिम में एक विशाल तालाब है जो इस समय भी कमल के फूलों से भरा रहता है।

सत्तासी नरेश और उनका काल तो इतिहास के पन्नों में अब समा चुका है, लेकिन उनका बनवाया हुआ मंदिर आज भी श्रद्धा एवं शिव भक्ति भाव का प्रतीक है।
रुद्रपुर कस्बे में आज भी सैकड़ों छोटे बड़े भगवान शिव के मंदिर एवं शिवलिंग मिल जाएंगे। पुराने मकानों एवं खण्डहरों में से छोटे शिवलिंग एवं शिव मूर्तियों का मिलना इस बात का प्रमाण है कि रुद्रपुर में पुरातन काल में घर-घर भगवान शिव की पूजा एवं आराधना होती थी, इसलिए रुद्रपुर को दूसरी काशी का नाम दिया गया है।

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