बुधवार के दिन भगवान गणेश जी की पूजा क्यों की जाती है|

बुधवार के दिन भगवान गणेश जी की पूजा क्यों की जाती है|

गणेश शिवजी और पार्वती के पुत्र हैं। उनका वाहन डिंक नामक मूषक है। गणों के स्वामी होने के कारण उनका एक नाम गणपति भी है। ज्योतिष में इनको केतु का देवता माना जाता है और जो भी संसार के साधन हैं, उनके स्वामी श्री गणेशजी हैं। हाथी जैसा सिर होने के कारण उन्हें गजानन भी कहते हैं। गणेश जी का नाम हिन्दू शास्त्रो के अनुसार किसी भी कार्य के लिये पहले पूज्य है। इसलिए इन्हें आदिपूज्य भी कहते है। गणेश कि उपसना करने वाला सम्प्रदाय गाणपतेय कहलाते है।

हिन्दू संस्कृति और पूजा में भगवान श्रीगणेश जी को सर्वश्रेष्ठ स्थान दिया गया है। गणपति की महिमा को सभी जानते हैं और यह भी जानते हैं कि वे माता पार्वती और भगवान शिव के पुत्र हैं। लेकिन बहुत कम लोग हैं जो इससे आगे गणेश के परिवार के बारे में जानते हैं, उनकी पत्नी और बच्चों के बारे में जानते हैं। जी हां भगवान श्री गणेश की पत्नियां भी हुई और बच्चे भी। मान्यता है कि यदि बुधवार के दिन इनके परिवार की पूजा की जाये तो भगवान श्री गणेश की कृपा अवश्य मिलती है।

प्रत्येक शुभ कार्य में सबसे पहले भगवान गणेश की ही पूजा की जानी अनिवार्य बताई गयी है। देवता भी अपने कार्यों की बिना किसी विघ्न के पूरा करने के लिए गणेश जी की अर्चना सबसे पहले करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि देवगणों ने स्वयं उनकी अग्रपूजा का विधान बनाया है। शास्त्रों में एक बार जिक्र आता है कि भगवान शंकर त्रिपुरासुर का वध करने में जब असफल हुए, तब उन्होंने गंभीरतापूर्वक विचार किया कि आखिर उनके कार्य में विघ्न क्यों पड़ा? तब महादेव को ज्ञात हुआ कि वे गणेशजी की अर्चना किए बगैर त्रिपुरासुर से युद्ध करने चले गए थे। इसके बाद शिवजी ने गणेशजी का पूजन करके उन्हें लड्डुओं का भोग लगाया और दोबारा त्रिपुरासुर पर प्रहार किया, तब उनका मनोरथ पूर्ण हुआ।

सनातन एवं हिन्दू शास्त्रों में भगवान गणेश जी को, विघ्नहर्ता अर्थात सभी तरह की परेशानियों को खत्म करने वाला बताया गया है। पुराणों में गणेशजी की भक्ति शनि सहित सारे ग्रहदोष दूर करने वाली भी बताई गई हैं। हर बुधवार के शुभ दिन गणेशजी की उपासना से व्यक्ति का सुख-सौभाग्य बढ़ता है और सभी तरह की रुकावटे दूर होती हैं।

किसी भी मांगलिक कार्य में, घरों के द्वार पर, पूजाघर में, धार्मिक तस्वीरों, पोस्टरों आदि में अक्सर आपने शुभ और लाभ लिखा देखा होगा। दरअसल इन्हें भगवान गणेश की संतान माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार शुभ और क्षेम भगवान गणेश की संतान है जिन्हें शुभ-लाभ भी कहा जाता है। रिद्धी और सिद्धी भगवान गणेश की पत्नियां मानी जाती हैं। कुछ कथाओं में संतोषी मां को भी भगवान गणेश की पुत्री बताया गया है।

हिन्दू शास्त्रों के एक कथा के अनुसार चूंकि भगवान श्री गणेश का शरीर विशालकाय और मुंह की जगह हाथी का मुख लगा हुआ था तो कोई सुशील कन्या श्री गणेश से विवाह को तैयार न थी। इस पर भगवान गणेश बहुत बिगड़ गये और अपने वाहन मूषक को समस्त देवी-देवताओं के विवाह में विघ्न डालने की कही। सारे देवता परेशान हो गये किसी का विवाह भी ठीक ठाक संपन्न नहीं हो रहा था। कभी मंडप जमींदोज हो जाते कभी बारात को आगे प्रस्थान करने के लिये रास्ता ही नहीं बचता। तंग आये देवताओं ने भगवान ब्रह्मा से कोई उपाय करने की गुहार लगाई तब ब्रह्मा ने दो कन्याओं ऋद्धि और सिद्धी का सृजन किया और भगवान गणेश से उनका विवाह करवाया।

इस तरह बुद्धि और विवेक की देवी रिद्धि और सफलता की देवी सिद्धी का विवाह भगवान गणेश जी से हुआ जिनसे शुभ और लाभ नामक दो पुत्र भी हुए। मंगलदायक भगवान गणेश भगवान शिव व माता पार्वती के पुत्र हैं। इन्हें बुद्धि एवं विवेक का प्रतीक माना जाता है। ऋद्धि और सिद्धि इनकी पत्नियां हैं, ऋद्धि से लाभ एवं सिद्धि से शुभ हुए यानि लाभ और शुभ ये इनके दो पुत्र माने जाते हैं। हर शुभ कार्य में भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है।

भगवान गणेश जहां विघ्नहर्ता हैं वहीं रिद्धि और सिद्धि से विवेक और समृद्धि मिलती है। शुभ और लाभ घर में सुख सौभाग्य लाते हैं और समृद्धि को स्थायी और सुरक्षित बनाते हैं। सुख सौभाग्य की चाहत पूरी करने के लिये बुधवार को गणेश जी के पूजन के साथ ऋद्धि-सिद्धि व लाभ-क्षेम की पूजा भी विशेष मंत्रोच्चरण से करना शुभ माना जाता है। इसके लिये सुबह या शाम को स्नानादि के पश्चात ऋद्धि-सिद्धि सहित गणेश जी की मूर्ति को स्वच्छ या पवित्र जल से स्नान करवायें, लाभ-क्षेम के स्वरुप दो स्वस्तिक बनाएं, गणेश जी व परिवार को केसरिया, चंदन, सिंदूर, अक्षत और दूर्वा अर्पित कर सकते हैं।

गणेशजी के अनेक नाम हैं लेकिन ये 12 नाम प्रमुख हैं- सुमुख, एकदंत, कपिल, गजकर्णक, लंबोदर, विकट, विघ्न-नाश,विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र, गजानन। उप्रोक्त द्वादश नाम नारद पुरान में पहली बार गणेश के द्वादश नामवलि में आया है। विद्यारम्भ तथ विवाह के पूजन के प्रथम में इन नामो से गणपति के अराधना का विधान है|

No Responses

Write a response