किशन कन्हैया दही हांडी

किशन कन्हैया दही हांडी

दही हांडी – किशन कन्हैया को समर्पित है ये उत्सव
जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्म के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला पर्व है। इस दिन देश भर में आयोजित होने वाले उत्सवों में भगवान श्री कृष्ण के जन्म की लीलाओं को दिखाया जाता है। श्री कृष्ण के जन्म की कथाएं सुनी जाती हैं। लेकिन एक ऐसा उत्सव भी है जिसकी महाराष्ट्र सहित दक्षिण भारत में खास धूम रहती है। जिसमें हर कोई भगवान श्री कृष्ण के बाल रुप को धारण कर गोविंदा बन जाता है। जिसमें हर कोई मटकी फोड़ बनने की होड़ में लगा रहता है। इस उत्सव को कहा जाता है दही हांडी।

क्या है दही हांडी

जन्माष्टमी के अवसर पर जन्माष्टी से अगले दिन युवाओं की टोलियां काफी ऊंचाई पर बंधी दही की हांडी (एक प्रकार का मिट्टी का बर्तन) को तोड़ती हैं। इसके लिये मानवीय पिरामिड का निर्माण करते हैं और एक प्रतिभागिता इस पिरामिड के ऊपर चढ़कर मटकी को तोड़ता है। महाराष्ट्र और गोआ के विभिन्न क्षेत्रों में दही-हांडी प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जाता है। जो टोली दही हांडी को फोड़ती है उसे विजेता घोषित किया जाता है। प्रतियोगिता को मुश्किल बनाने के लिये प्रतिभागियों पर पानी की बौछार भी की जाती है। इन तमाम बाधाओं को पार कर जो मटकी फोड़ता है वही विजेता होता है। इस उतस्व की खास बात यह भी है कि जो भी इस प्रतियोगिता में हिस्सा लेता है उस हर युवक-युवती को गोविंदा कहा जाता है।

कैसे शुरु हुई दही-हांडी की परंपरा

मान्यता है कि जब भगवान श्री कृष्ण बालक थे तो उन्हें दही, मक्खन इत्यादि खाने का बड़ा शौक था। अपने इसी शौक के चलते उन्होंनें पास-पड़ौस से दही चुरानी शुरु करदी। रास्तों में आती जाति ग्वालिनों की मटकियां भी वे फोड़ देते। इस काम में उनके दोस्त भी मदद करने लगे। धीरे-धीरे सभी उनसे तंग रहने लगे तो उन्होंने एक युक्ति सूझी। उन्होंने दही की हांडी को काफी ऊंचाई पर लटकाना शुरु कर दिया ताकि बालकों की पंहुच वहां तक न हो। ऐसे में श्री कृष्ण के सामने भी ये चुनौति खड़ी हो गई कि अब क्या किया जाये तो उनके जहन में एक विचार उत्पन्न हुआ। उन्होंनें अपने सभी दोस्तों को पास बुलाया और एक सर्कल बनाने की कही फिर आपस में मिलकर खड़े होने की कहा। इस तरह एक के ऊपर एक सर्कल बनाकर सबसे ऊपर वे स्वयं चढ़े और ऊपर लटक रही दही हांडी को तोड़कर अपने सभी दोस्तों को दही-मक्खन का स्वाद चखाया। माना जाता है कि तब से शुरु हुई यह परंपरा आज तक अनवरत चली आ रही है, बस समय के साथ इसके उद्देश्य और स्वरुप में बदलाव आ गया है।

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