जाने क्या खास है आज गौवत्स द्वादशी में कैसे बदलेगा आपका भाग्य कथा पढ़े और अपना जीवन सफल बनाये|

जाने क्या खास है आज गौवत्स द्वादशी में कैसे बदलेगा आपका भाग्य कथा पढ़े और अपना जीवन सफल बनाये|

क्या है गोवत्स द्वादशी

भाद्रपद मास में कृष्ण पक्ष की द्वादशी को गोवत्स द्वादशी के नाम से जाना जाता है। इसे आैर भी कर्इ नामों से जाना जाता है जैसे वन द्वादशी, वत्स द्वादशी, आैर बछ बारस आदि। इस साल महिलाओं के द्वारा गाय और बछड़े के पूजन का यह त्यौहार इस वर्ष 7 सितंबर 2018 को मनाया जाएगा। यह त्यौहार संतान की कामना आैर उसकी सुरक्षा के लिए किया जाता है। इसमें गाय – बछड़ा आैर बाघ – बाघिन की मूर्तियां बना कर उनकी पूजा की जाती है। साथ ही साथ महिलायें असली गाय और बछड़े की पूजा भी करती हैं। गोवत्स द्वादशी के व्रत में गाय का दूध – दही, गेहूं और चावल नहीं खाने का विधान है। इनके स्थान पर इस दिन अंकुरित मोठ, मूंग, तथा चने आदि को भोजन में उपयोग किया जाता है और इन्हीं से बना प्रसाद चढ़ाया जाता है। इस दिन द्विदलीय अन्न का प्रयोग किया जाता है। साथ ही चाकू द्वारा काटा गया कोई भी पदार्थ भी खाना वर्जित होता है। व्रत के दिन शाम को बछड़े वाली गाय की पूजा कर कथा सुनी जाती है फिर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

कैसे करें इसका व्रत एवम् पूजन

वत्स द्वादशी पूजा विधि

व्रत के दिन सुबह स्नान आदि से निवृत होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। दूध देने वाली गाय को बछडे़ सहित स्नान करायें, फिर उनको नया वस्त्र चढ़ाते हुए पुष्प अर्पित करें आैर तिलक करें। कुछ जगह पर लोग गाये सींगों को सजाते हैं आैर तांबे के पात्र में इत्र, अक्षत, तिल, जल तथा फूलों को मिलाकर गौ का प्रक्षालन करते हैं। इस दिन पूजा के बाद गाय को उड़द से बना भोजन करायें। पूजन करने के बाद वत्स द्वादशी की कथा सुनें। गोधूलि में सारा दिन व्रत करके गौमाता की आरती करें। उसके बाद भोजन ग्रहण करें। जो लोग इस पर्व को वन द्वादशी के रूप में मनाते हैं वे पूजा के लिए प्रात:काल स्नान करके लकड़ी के पाटे पर भीगी मिट्टी से सात गाय, सात बछड़े, एक तालाब और सात ढक्कन वाले कलश बनायें। इसके बाद पूजा की थाली में भीगे हुए चने-मोठ, खीरा, केला, हल्दी, हरी दूर्वा, चीनी, दही, कुछ पैसे आैर चांदी का सिक्का रखें। अब एक लोटे में पानी लेकर उसमें थोड़ा कच्चा दूध मिला लें। माथे पर हल्दी का टीका लगा कर व्रत की कहानी सुनें।कथा के बाद कुल्हड़ीयों में पानी भरकर पाटे पर चढ़ा दें आैर खीरा, केला, चीनी व पैसे भी चढ़ा दें। इसके बाद एक परात को पटरे के नीचे रख कर तालाब में सात बार लोटे में कच्चा दूध मिला जल चढ़ायें। गाय तथा बछड़ो को हल्दी से टीका लगायें। परात का जल, चांदी का सिक्का व दूब हाथ में लेकर चढ़ायें। इस पटरे को धूप में रख दें आैर जब उसकी मिट्टी को सुख तो उसे किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दें आैर पटरे का सामान मालिन आदि को देदें।

कर्इ कथायें हैं प्रचलित

((( गौ कथा )))

ये कथा भीष्म पितामह ने युधिषिठर को सुनाई थी .
असल में भीष्म पितामह का कहना था कि गाय का मूत्र और गोबर इतना गुणवान है कि इससे हर रोग का निवारण हो सकता है
इतना ही नहीं इसमें माँ लक्ष्मी का भी वास होता है इसलिए इसे बहुत शुभ माना जाता है बस यही कारण है कि इस गौवत्स द्वादशी के मौके पर हम आपको ये कथा सुना रहे है और गाय की पवित्रता भी दर्शा रहे है

हमारे हिन्दू धर्म में गाय को माँ का दर्ज़ा दिया जाता है . कुछ लोग इससे गाय माँ और कुछ गाय माता कहते है . यहाँ तक कि अगर हम शास्त्रो का इतिहास देखे तो गाय भगवान् कृष्ण को बहुत प्रिय लगती थी इसलिए तो वो ज्यादातर समय अपनी गायों के साथ व्यतीत करते थे . ये अलग बात है कि आज कल गाय को खाने की वस्तु के रूप में भी प्रयोग किया जाने लगा है जिसके लिए बहुत खेद है .

हम जानते है कि केवल हमारे खेद करने से ये पाप रुकने नहीं वाला इसलिए समझाने से कोई फायदा नहीं बस उम्मीद कर सकते है जो लोग गाय को एक वस्तु समझ कर उसका सेवन करते है वो भी जल्द ही ये सब बन्द कर दे

भीष्म पितामह ने सुनाई युधिषिठर को ये कथा..
—एक बार लक्ष्मी जी ने मनोहर रूप यानि बहुत ही अध्भुत रूप धारण करके गायों के एक झुंड में प्रवेश कर लिया और उनके इस सुंदर रूप को देखकर गायों ने पूछा कि, देवी . आप कौन हैं और कहां से आई हैं?

गायों ने ये भी कहा कि आप पृथ्वी की अनुपम सुंदरी लग रही हो . तब गायों ने एकदम से कहा कि सच सच बताओ, आखिर तुम कौन हो और तुम्हे कहाँ जाना है ?
तब लक्ष्मी जी ने विन्रमता से गायों से कहा कि तुम्हारा कल्याण हो असल में मैं इस जगत में अर्थात संसार में लक्ष्मी के नाम से प्रसिद्ध हूं और सारा जगत मेरी कामना करता है मुझे ही पाना चाहता है . मैंने दैत्यों को छोड़ दिया था और इसलिए वे सदा के लिए नष्ट हो गए
इतना ही नहीं मेरे आश्रय में रहने के कारण इंद्र, सूर्य, चंद्रमा, विष्णु, वरूण तथा अग्नि आदि सभी देवता सदा के लिए आनंद भोग रहे हैं। इसके बाद माँ लक्ष्मी ने कहा कि जिनके शरीर में मैं प्रवेश नहीं करती, वे सदैव नष्ट हो जाते हैं और अब मैं तुम्हारे शरीर में ही निवास करना चाहती हूं
लेकिन इसके बाद भी कथा अभी खत्म नहीं हुई क्योंकि गायों ने अब तक माँ लक्ष्मी को अपनाया नहीं था .

गायों ने क्यूँ किया माँ लक्ष्मी जी का त्याग..
देवी लक्ष्मी की इन बातों को सुनने के बाद गायों ने कहा कि तुम बड़ी चंचल हो, इसलिए कभी कहीं भी नहीं ठहरती . इसके इलावा तुम्हारा बहुतों के साथ भी एक सा ही संबंध है, इसलिए हमें तुम्हारी इच्छा नहीं है तुम्हारी जहां भी इच्छा हो तुम चली जाओ तुमने हमसे बात की, इतने में ही हम अपने आप को तुम्हारी कृतार्थ यानि तुम्हारी आभारी मानती हैं

गायों के ऐसा कहने पर लक्ष्मी ने कहा , कि ये तुम क्या कह रही हो ? मैं दुर्लभ और सती हूं अर्थात मुझे पाना आसान नहीं ,पर फिर भी तुम मुझे स्वीकार नहीं कर रही, आखिर इसका क्या कारण है ? यहाँ तक कि देवता, दानव, मनुष्य आदि सब कठोर तपस्या करके मेरी सेवा का सौभाग्य प्राप्त करते हैं अत:तुम भी मुझे स्वीकार करो . वैसे भी इस संसार में ऐसा कोई नहीं जो मेरा अपमान करता हो .

ये सब सुन कर गायों ने कहा , कि हम तुम्हारा अपमान या अनादर नहीं कर रही, केवल तुम्हारा त्याग कर रही हैं और वह भी सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम्हारा मन बहुत चंचल है . तुम कहीं भी जमकर नहीं रहती अर्थात एक स्थान पर नहीं रुक सकती . इसलिए अब बातचीत करने से कोई लाभ नहीं तो तुम जहां जाना चाहती हो, जा सकती हो इस तरह से गायों ने माँ लक्ष्मी का त्याग कर दिया क्योंकि गायों को मालूम था कि लक्ष्मी कभी किसी एक के पास नहीं रहती बल्कि पूरे संसार में घूमती है पर फिर भी माँ लक्ष्मी ने हार नहीं मानी और इतना सब होने के बाद भी वार्तालाप ज़ारी रखी
अब आखिर में माँ लक्ष्मी ने कहा , गायों. तुम दूसरों को आदर देने वाली हो और यदि तुमने ही मुझे त्याग दिया तो सारे जगत में मेरा अनादर होने लगेगा . इसलिए तुम मुझ भी पर अपनी कृपा करो मैं तुमसे केवल सम्मान चाहती हूँ

तुम लोग सदा सब का कल्याण करने वाली, पवित्र और सौभाग्यवती हो तो मुझे भी बस आज्ञा दो, कि मैं तुम्हारे शरीर के किस भाग में निवास करूं?
इसके बाद गायों ने भी अपना मन बदल लिया और गायों ने कहा, हे यशस्विनी . हमें तुम्हारा सम्मान आवश्य ही करना चाहिए इसलिए तुम हमारे गोबर और मूत्र में निवास करो, क्योंकि हमारी ये दोनों वस्तुएं ही परम पवित्र हैं।

तब माँ लक्ष्मी ने कहा, धन्यवाद् और धन्यभाग मेरे, जो तुम लोगों ने मुझ पर अनुग्रह किया यानि मेरे प्रति इतनी कृपा दिखाई मैं आवश्य ऐसा ही करूंगी . मैं सदैव तुम्हारे गोबर और मूत्र में ही निवास करूंगी सुखदायिनी गायों अर्थात सुख देने वाली गायों तुमने मेरा मान रख लिया , अत: तुम्हारा भी कल्याण हो बस यही वजह है कि गाय की इन दो वस्तुओ को लक्ष्मी का ही रूप समझा जाता है .

इस कथा को पढ़ने के बाद ये तो समझ आ ही गया होगा कि गाय का धार्मिक ग्रंथो के अनुसार कितना महत्व है।इसलिए हमको आजके दिन गौ सेवा और गौ पूजन करना चाहिए जय गौ माता जय गोपाल भक्त वत्सल प्रभु दीनदयाल |

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